कविता / ग़ज़ल

कभी नैतिकता की मूर्ति भारतवर्ष में
यह था अनैतिकता का चरमोत्कर्ष।
की केशो तक जा पहुंचे थे हाथ
जिनको करना था चरणस्पर्श।

द्रौपदी चीरहरण
तुम मेरे हृदय को हाथों से सहलाती हो सिर रखकर अपने अश्रु से नहलाती हो विरह के दिन याद कर मुझसे पूछती हो क्या मुझे याद करते थे मुरलीधर ?……….कृष्ण स्वपन

लेकिन महामारी में महा मजबूरी है
कि मैं नौकरी किए जा रही हूं
तबादले से घर वापसी की आस लिए
बिना परिवार के ही जिए जा रही हूं………महामारी और मेरा तबादला

यादों के बादल आंखों से जब झड़ते यार अपने अपनों का रूप धरते कुछ इस तरह हम जिंदगी जिया करते थोड़ा सा डूबते थोड़ा सा उभरते………हॉस्टल के दिन
हम वर्किंग मैरिड women ka Kuchh alag hi dukh bhara फसाना है ऑफिस से जल्दी जाने पर बॉस और घर लेट आने पर सास मारती ताना है………….shadi ke side effect
कभी दूर ना जाऊं तुमसे बस तुममें ही ठहर जाऊं…….बिगड़ जाऊ
मेरे नखरे घटे हो उनके तेवर खतम ऐ जिंदगी तेरा बहुत है सितम…………..सितम
हर खुशी खत्म होती उसकी नशे की अंधेरी गलियों में अब तो मां और समाज , दोनों के लिए वो एक खतरा है………..आसरा

दीदी के कलम से

मेरी समझ में यह नहीं आता है ,

यह डॉक्टर जानवरों को कैसे समझ पाता है

नीम का पेड़

जिंदगी में कभी भी तू, किसी मुश्किल से ना हारे।

हर खुशी दस्तक दे, दिन रात तेरे ही द्वारे।……

तू चांद बनी रहे

कहानी

पड़ोसन ने अपने आंगन से उसके तरफ मुस्कुराते हुए देखा और पूछा -आज छुट्टी है क्या ??……..

खुशकिस्मत

भ्रष्ट साथी कर्मचारियों का यह अटूट विश्वास था कि आती हुई लक्ष्मी को कभी मना नहीं करना चाहिए इससे लक्ष्मी का अपमान होता है ।……….

विदाई

संस्मरण

प्रतीक्षारत

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अनुप्रास / तुकबंदी

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- More Than a Women

प्रतीक्षारत

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